Sat. Feb 22nd, 2020

दबंग चीन से मुकाबले की रणनीति

आखरीआंख
बैंकाक में हुई आसियान संगठन की शिखर वार्ता के बाद भारत के लिए नई आर्थिक और सामरिक चुनौतियां उठ खड़ी हुई हैं। जिस दिन से भारत ने इस संगठन की सदस्यता लेनी चाही है तब से चीन इसमें किसी न किसी तरह का अड़ंगा लगाने पर उतारू है। पहले आसियान संघ में भारत का प्रवेश रोकने को चीन का अड़चनें डालना और फिर यह सुनिश्चित करना कि अगर सदस्यता मिल जाए तो वह हाशिए पर ही रहे, यह दोनों प्रयास अब असफल हो चुके हैं। तेजी से आर्थिक तरक्की करने वाले आसियान देशों के इस संगठन में भारत ने जल्द ही बतौर पूर्ण सदस्यता पा ली है। लगभग सभी आसियान सदस्यों ने भारत की भागीदारी को रचनात्मक और उपयोगी कहा है। मुखर हुआ चीन कुछ वर्षों से समुद्री सीमा संबंधी अपने एकदम बेजा दावों को मनवाने की खातिर शक्ति के प्रयोग और जोर-जबरदस्ती तक पर उतर आया है। आसपास के देशों की समुद्री सीमा में पड़ते भुक्तभोगी मुल्कों में कुछ आसियान संगठन के सदस्य भी हैं।
दक्षिण कोरिया, जापान, ताईवान, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और इंडोनेशिया के साथ समुद्री सीमा दावों को अपने पक्ष में करने हेतु चीन दबंगता भरा व्यवहार अपनाता आया है। इसके लिए उसने अंतरराष्ट्रीय कानून के उन प्रावधानों को भी नजरअंदाज कर दिया जब फिलीपींस के एक टापू पर कब्जा करने के बाद समुद्री विवादों के लेकर बने अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने चीन के दावों को खारिज कर दिया था। हाल फिलहाल वह वियतनाम के दक्षिणी तटों पर अपने युद्धक पोत तैनात कर रहा है। वह वियतनाम और इंडोनेशिया को छोड़कर साथ लगते लगभग सभी आसियान सदस्यों से जबरदस्ती अपनी बात मनवाने में सफल हो चुका है। यहां तक कि मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर शमीर, जो जमू-कश्मीर पर पाकिस्तान का पक्ष लेते आए हैं, ने भी स्वीकार किया है कि चीन इतना ताकतवर है कि उनका देश समुद्री सीमा को लेकर चीनी दावों पर उसे चुनौती देने लायक नहीं है।
भारत ने क्षेत्रीय मामलों पर आसियान सदस्यों के सामूहिक विचारों का समर्थन करके सही काम किया है, जबकि कई आसियान सदस्य चीन द्वारा अपने साथी मुल्कों की समुद्री सीमा का अतिक्रमण करने वाले कृत्यों पर चुप्पी साधे बैठे रहे। अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा विवादों पर भारत ने बाकायदा कह दिया है कि समुद्र संबंधी सीमा विवादों पर सयुंक्त राष्ट्र ने जो कानून बनाए हैं, उन्हीं के मुताबिक निर्धारण किया जाए। उदाहरण देते हुए भारत ने बांग्लादेश के साथ टापू पर हुए विवाद को गिनाया है, जिसमें वह द्वीप बांग्लादेश को सौंप दिया था।
धक्केशाही के मुद्दई चीन और भारत के बीच इसलिए मतभेद आगे भी बने रहेंगे। कश्मीर में अनुछेद 370 हटाए जाने के बाद चीन कई मुद्दों पर भारत के प्रति अनेक मंचों पर असामान्य रूप से आक्रामक रहा है। चीन ने हालांकि वर्ष 1996 में तत्कालीन राष्ट्रपति जियांग ज़ेमिन की भारत-पाक यात्रा के बाद से यह स्टैंड अपनाये रखा था कि दोनों मुल्कों को अपने आपसी विवाद बातचीत के जरिए ही सुलझाने चाहिए लेकिन चीन की इस नीति में हाल ही में बहुत बड़ा बदलाव हुआ है और उसने जमू-कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्र सत्र, मानवाधिकार आयोग समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का साथ दिया है। यहां तक कि जिस रोज चीनी राष्ट्रपति भारत में मल्लापुरम की यात्रा पर थे, उस दिन भी उसने यही किया था। भारत ने भी सार्वजनिक तौर पर पलटवार में अक्साई चिन की विवादित सीमा को केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का हिस्सा बताया है। इस दावे को लेकर चीन ने जो असहजता दिखाई है, उस पर लद्दाख के अधिसंय बौद्ध भिक्षुओं ने भारत की बात का समर्थन कर दिया, जिससे वह और यादा भुनभुनाया है।
अलबत्ता बैंकाक में हुए शिखर समेलन में प्रस्तावित ‘एशिया मुक्त व्यापार संधिÓ का हिस्सा बनने पर भारत की अनिछा के पीछे ठोस आर्थिक वजह है क्योंकि यह भरोसेमंद सुरक्षा उपायों से रहित है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 59 बिलियन डॉलर है (हमारा निर्यात आयात के मुकाबले कहीं कम है)। इसी तरह दक्षिण कोरिया के साथ यह अंतर 5 बिलियन डॉलर से बढ़कर पिछले साल 12 बिलियन डॉलर हो चुका है तो आसियान देशों के साथ फर्क शून्य से शुरू होकर 14 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। चीन के साथ व्यापार घाटे के लिए जिमेवार गलत चीनी नीतियों की शिनात करना हमारे लिए न्यायसंगत है। हमारा वस्त्र उद्योग बांग्लादेश और वियतनाम के वस्त्र निर्यात का मुकाबला नहीं कर पाया है परंतु सरकार इस गंभीर आर्थिक घाटे से बचने हेतु एक स्पष्ट और बृहद निर्यात उन्नयन योजना तक नहीं बना पाई है।
इसके बावजूद हम हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में चीनी ताकत से संतुलन बिठाने और उसकी बढ़ती दबंगता का सामना करने में सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और आसियान सदस्य, खासकर वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ हमारी नौवहनीय सहकारिता बढ़ रही है। यह सुखद रहा कि बैंकाक में हुई शिखर वार्ता में अनेक आसियान सदस्य इस संगठन में हमारे प्रवेश को सुनिश्चित करने के रास्ते खुद ढूंढऩे में लगे थे ताकि भारत इस इलाके में राजनयिक, आर्थिक और सैन्य तौर पर प्रभावशाली भूमिका निभा सके।
भारत ने अपनी ‘एक्ट ईस्टÓ (पूर्वी देशों से संबंध बढ़ाओ) नीति में अब तक व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने जैसे रिवायती उपाय तो किए हैं लेकिन आसियान देशों के अलावा अन्य पूर्वी देशों जैसे जापान और कोरिया से संबंध प्रगाढ़ करने में वह अपनी सबसे महत्वपूर्ण थाती को भुलाए बैठा है। यानी इन देशों से धार्मिक पर्यटक आने की अकूत संभावना। भारत को अंतरराष्ट्रीय नजरिए में बतौर ‘पर्यटक मित्रÓ देश नहीं समझा जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि पूर्वी बौद्ध धर्मावलंबियों का बतौर धार्मिक पर्यटक और यात्री बतौर ‘अतिथि देवो भवÓ स्वागत करना चाहिए। इन मुल्कों के साथ साझी आध्यात्मिक विरासत को कल्पनाशीलता से सद्कमाई का साधन बनाया जा सकता है। धार्मिक एवं आम पर्यटन वाले अवयव को समाहित करते हुए ‘एक्ट ईस्टÓ नीति में नया आयाम जोड़ा जाना चाहिए। पूर्व में थलीय और सागरीय सीमाओं से परे लगभग 46 करोड़ बौद्ध धर्मावलबी फैले हुए हैं।
अकेले चीन में अमूमन 24.4 करोड़ बौद्ध हैं। फिर जापान, थाईलैंड, यांमार, वियतनाम, श्रीलंका और अन्य ऐसे मुल्क हैं जहां लाखों-करोड़ों की तादाद में बुद्ध के अनुयायी हैं। धार्मिक पर्यटन का तंत्र विकसित करने में भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुबिनी वाले नेपाल को साथ लिया जाना चाहिए।
हमारे पूर्वी पड़ोसियों से आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक मतभेद सुलझाने की दिशा में भारत के आध्यात्मिक विरासत वाले बौद्ध स्थल महती भूमिका निभा सकते हैं। हमें बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, लद्दाख, ओडिशा और आंध्र प्रदेश स्थित महत्वपूर्ण बौद्ध धार्मिक स्थलों के बीच गतिशील टूरिम सर्किट बनाने हेतु ‘मास्टर प्लानÓ की जरूरत है। इस प्रारूप को मूर्त रूप देने और बढ़ावा देने का सबसे उत्तम तरीका यह है कि हम एकदम पड़ोसी देश यांमार और श्रीलंका के अतिरिक्त चीन, जापान और थाईलैंड को साथ जोड़ लें और वे इस परियोजना में निवेश करें, इससे न केवल हमारा देश एशिया के बड़े भूभाग पर फैली बौद्ध जनसंया के लिए ‘पर्यटक मित्रÓ बनेगा बल्कि यह काम धार्मिक पर्यटन की बदौलत संबंध प्रगाढ़ करने की दिशा में ‘एक्ट ईस्टÓ नीति में महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा करेगा।

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