अनु. 370 : अलगाववाद का बन रहा था सहारा

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आखरीआंख
आज भारत के इतिहास में एक निर्णायक फैसले का दिन घटित हुआ है। बहुत कम बार ऐसा होता है, जब आपके सामने ही देश और इतिहास बदलता है।
धारा 370 और उसके साथ 35-ए का समाप्त होना जमू-कश्मीर, लद्दाख की दृष्टि से एक युगांतकारी घटना है। जिससे जमू, लद्दाख और अन्य देशभक्त नागरिकों के लंबे संघर्ष और जिजीविषा के चलते आज केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की भूमिका से धर्मनिरपेक्ष भारत में मुस्लिम राय के समान और एक अलगाववादी मुस्लिम वर्चस्व की राजनीति का अंत हुआ है।
धारा 370 के एक भुक्तभोगी नागरिक के नाते मैं कह रहा हूं कि इसी ने अलगाववादी सोच को जन्म दिया, जिसके चलते आतंकवाद का जन्म हुआ। और जिसे आगे चलकर विशेष दरजा कहा गया या कश्मीरियत कह के प्रचारित व प्रसारित किया गया, आज यह सिद्ध हुआ कि मुस्लिम धार्मिक अस्मिता के साथ छेड़छाड़ है। अर्थात जिसे आज तक ये लोग कश्मीरियत को मुखौटे के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, वह दरअसल मुस्लिम सांप्रदायिक राजनीति थी। अगर ऐसा नहीं था जैसा कि कश्मीर का नेतृत्व आज तक कहता रहा है कि कश्मीरियत की लड़ाई थी तो लाखों कश्मीरी पंडितों को रातों-रात क्यों घर-बार छोडऩे का फरमान सुनाया गया? धारा 370 के रहते सन् 1990 में क्यों कश्मीरी पंडितों को जलावतनी का शिकार बनाया गया।
अगर ऐसे नियम और कानून सही थे और कश्मीरियत के लिए थे तो ऐसा नहीं होना चाहिए था। साबित होता है कि 370 एक मुस्लिम अलगाववादी सांप्रदायिक राजनीति के वर्चस्व का मुखौटा भर था। और इसे धराशायी करने के साथ ही भारत देश के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र के भविष्य और भाग्य पर मंडरा रहे खतरे का अंत हुआ।
अब चूंकि लद्दाख केंद्र शासित राय बन चुका है, जो दशकों से कश्मीर केंद्रित मुस्लिम राजनीति के वर्चस्व के नीचे छटपटा रहा था। उसके साथ जो अन्याय और भेदभाव था, उसके विरोध में वह लोग दशकों से लड़ाइयां लड़ रहे थे। उनकी वष्रों से सियासी आवाज थी कि वे बजाय कश्मीर के सीधे केंद्रशासित क्षेत्र में रहें। इसी तरह, जमूवासी भी कश्मीर केंद्रित राजनीति से नाराज और उपेक्षित और अन्याय से जूझते आए हैं और धर्मनिरपेक्ष भारत में या तथाकथित कश्मीरियत वाले कश्मीर से कश्मीरी पंडितों की जलावतनी में देश भर में और विदेशों में भी संघर्ष चला रहा था, उस दिशा में भी 370 का हटाया जाना एक उपलिब्ध ही माना जाएगा। नि:संदेह यह एक युगांतकारी घटना है। इसके साथ ही कश्मीर के नेताओं में ब्लैकमेल व शोषण की राजनीति का भी खात्मा हो गया। इसके अलावा, केंद्र सरकारों ने विगत में एक ठंडा रवैया अपनाए रखा, जिसके चलते अलगाववादी नेता पैदा हुए। इसमें शेख अब्दुल्लाह से लेकर महबूबा मुती तक शामिल हैं। और केंद्र की सरकारें इसी अलगाववाद के रास्ते और इन लोगों के साथ प्रयोग करके कश्मीर में स्थायी शांति के असफल प्रयोग करते आए हैं। आज वह ठंडा रवैया या टालू सोच भी जमींदोज हो गया। कड़े शब्दों में कहें तो पिछले 70 साल में जमू, कश्मीर और लद्दाख की जो बेटियां राय से बाहर ब्याही गई हैं और 370 के अंतर्गत उसकी जो नागरिकता समाप्त हुई थी, उसकी आज बहाली का पहला दिन है।
लद्दाख और जमू-कश्मीर को केंद्रशासित घोषित करने से उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत मजबूत हुआ है। इस संघर्ष में लाखों निर्वासित कश्मीरी पंडितों की वापसी की उमीदें फलीभूत होंगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए। लाखों कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी के अंदर एक ही स्थान पर राजनीतिक और संवैधानिक अधिकार व गारंटी के साथ बसना चाहते हैं ताकि उन्हें फिर से न निकाला जाए। और इसके साथ ही हम सरकार से अपेक्षा करते हैं कि वह कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को स्वीकार करे और फिर उसे पलटने के लिए जरूरी कदम उठाए। आज तक कि सरकारों ने कश्मीरी पंडितों के जलावतनी को समुचित शब्दावली तक नहीं दी। इसे एक विस्थापन कहकर गौण कर दिया गया। जबकि हमारा विस्थापन घृणा की धार्मिक राजनीति के कारण घटित हुई थी। इसलिए इसे विस्थापन कहना अपमानजनक है। हम चाहेंगे कि सरकार हमारी त्रासदी को सही नाम से पुकारे और तद्नुसार निर्णायक कदम उठाए ताकि इस धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में किसी भी राय में किन्हीं भी लोगों के साथ ऐसी त्रासदी न घटे, जिसके हम शिकार हुए। सरकार सुप्रीम कोर्ट के रिटार्यड जज की अध्यक्षता में एक आयोग का भी गठन करे जो खून-खराबा करने वालों की पहचान कर उन्हें दंडित करे।

 

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